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सुबेदार रामचंद्र बचपन से कठिन परिश्रम और मेहनती थे।
बचपन गरीबी मे गुजरा पिताजी एक प्राइवेट फैक्ट्री मे मजदूर थे। बचपन में 10 वर्ष की उम्र से न्युज पेपर बांटने का काम किया साथ ही होटल मे मैस बाय का काम किया लेकिन पढाई नही छोडी ।और रोजाना सुबह रनिंग करते
26 अक्टूबर 1993 मे सेना मे एक सिपाही की पोस्ट पर भर्ती हुए। और मई 2010 मे कमीशन हुआ और जूनियर कमिशन आफिसर की पोस्ट हासिल किया।
सिक्किम डोकलाम से सुबेदार पद सेवानिवृत्त होकर वापस घर आए
बारामूला जम्मू-कश्मीर मे एक बार आतंकवादियो से तीन दिन तक चले आप्रेशन मे सूबेदार रामचंद्र की टीम ने तीन आतंकवादी मारे ।लेकिन टीम का भी एक जवान शहीद हो गया था।समय बहुत कठिन था।बिस्कुट और शक्कर पारे खाकर दिन निकाले।जिन्दगी का कोई विश्वास नही था कि वापिस घर कभी जा पायेगे या नही।लेकिन नजदीक गाव के एक मुस्लिम घर से हमे चाय पानी आयाऔर तभी ये महसूस हुआ कि हर मुस्लिम गद्दार नही होता
कारगिल युद्ध के दौरान राजस्थान के लोगेवाला मे तैनात थे। और आज देश की सेवा कर कर सेवा निर्मित होकर लोटे बाबा साहब की कृपा से समाज के लोगों ने भव्य स्वागत करा और अंबेडकर राष्ट्रीय युवा संघ की टीम की ओर से अंबेडकर चौराहे पर भव्य स्वागत करा गया जिनका सूबेदार रामचंद्र अभिवादन करते है।
