अल्पसंख्यक नेताओं को आपस में लड़ा कर ली सरकारें परवान चढ़ी,,,,,,
जर्नलिस्ट अंसार उल हसन सिद्दीकी भोपाल की क़लम से…
इतिहास के पन्नों में कांग्रेस की विचारधारा……..
नगर निगम चुनाव के मद्देनजर विगत दिनों कांग्रेस कमेटी की एक बैठक में एक वरिष्ठ मुस्लिम कांग्रेसी नेता के पक्ष में दूसरी मुस्लिम विधायक द्वारा वरिष्ठ कांग्रेसी नेता को जब मान सम्मान याद कराया गया तो कथित कांग्रेसी नेता भड़क उठे, और कांग्रेसी विधायक को मर्यादा का पाठ पढ़ा दिया जबकि स्वयं कांग्रेस का मध्यप्रदेश में इतिहास रहा है जब जब कांग्रेस की सरकार मध्यप्रदेश में रही या नहीं रही तब तब कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने हमेशा दो मुस्लिम कांग्रेसियों को आपस में लड़ा कर सियासत की है! जब तक मुस्लिम कांग्रेसियों को पार्टी की नीति रीति का पता चलता जब तक जिंदगी के लगभग 40 साल बीत गए और जब समझ में आया तब मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सरकार नहीं थी। मात्र दो विधायक अपने अपने दम पर अपने अपने क्षेत्रों से विधायक हैं वह पार्टी को गवारा नहीं है।और जब दो मुस्लिम विधायक आपस में एक दूसरे का मान सम्मान करने लगे और छोटा विधायक बड़े विधायक के लिए मान सम्मान की मांग करने लगे अपनी पार्टी से तो यह तो कतई गवारा नहीं है मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी को!
मध्य प्रदेश की राजनीतिक घटनाक्रम से जहां इस समय देश में बवाल मचा हुआ है धार्मिक उन्माद को लेकर वहीं पर मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी में एक घटनाक्रम ने सच्चाई की पोल खोल दी जिसको लेकर विगत 40 साल से एक वर्ग विशेष एक पार्टी सच्चाई सामने आ गई उस सच्चाई को समुदाय के बुजुर्ग मुस्लिम समुदाय को आगाह करते थे और आपसी भाईचारे को कायम रखने के लिए पुरजोर कोशिश करते थे और उस षड्यंत्र को हमेशा याद दिलाते थे की राजनीति में एक दूसरे के दुश्मन मत बनो मगर इतिहास गवाह है कि मध्य प्रदेश की कांग्रेसी सियासत ने मुसलमानों के शत प्रतिशत वोट लेकर ना सिर्फ मुसलमानों को ठगा है बल्कि मुस्लिम वर्ग को ही आपस में नफरत में बांट दिया! मैं जब ये समाचार लिख रहा हूं तो मुझे कुछ दृश्य सामने आ रहे हैं जिससे पता चलता है कि कांग्रेस की विचारधारा ने दो मुसलमानों को आपस में लड़ा कर अपनी राजनीति को चमकाया है और दो मुस्लिम कांग्रेसियों ने आपस में टकराकर मुसलमानों की मूलभूत समस्याओं से दूर होते गए और कांग्रेस की विचारधारा को नहीं समझ सके जिसमें उसकी मंशा दो लोगों को आपस में टकरा कर उनका जो वास्तविक हक मिलना चाहिए था उससे वंचित कर दिया चाहे गुफरान ए आज़म और असलम शेर खान का मामला हो या फिर रसूल अहमद सिद्दीकी और हसनात सिद्दीकी का आमने सामने का मामला हो या फिर रसूल भाई और आरिफ अकील का मामला हो और अंत में आरिफ अकील और आरिफ मसूद का मा
आज जब विधायक आरिफ मसूद ने वरिष्ठ विधायक और पूर्व कैबिनेट मंत्री आरिफ अकील का सम्मान किया तो फिर पार्टी की आंखें फटी की फटी रह गई उनको यह दोबारा कैसे हो सकता है दो मुस्लिम नेता अगर एक साथ हो जाएंगे तो फिर स्थिति बदल जाएगी क्योंकि सियासत इसी में है कि 2 लोगों को लड़ा कर उन में मतभेद चलते रहें और सियासत अपना काम करती है हालांकि यह मामला सभी पार्टियों का है और यह सच्चाई है कि जब मुसलमानों को पद और टिकट देने की बात आती है तो फिर इसी प्रकार की आपसी लड़ाई मतभेद मनभेद कराके राजनीति की जाती है इसके बहुत सारे सबूत मौजूद हैं! इस बात को मुस्लिम नेता समझने को तैयार नहीं है और उनसे ज्यादा वह बेचारे समर्थक जो दोनों तरफ होते हैं वह कतई नहीं चाहते कि दोनों नेता एक साथ रहे क्योंकि उन समर्थकों की राजनीति इसी में है कि वह अपने नेता को दूसरे नेता की बुराई करके और उसे मुगालते में रखकर अपना उल्लू सीधा करते रहें क्योंकि उनकी अपनी कमजोरी है उनकी अपनी रोजी रोटी का सवाल है और उसका कनेक्शन आपसी भाईचारे में नफरत फैला कर ही मुमकिन है अगर दोनों तरफ के समर्थक प्यार बात करेंगे तो फिर बहुत सारे जमीनी नेता पैदा हो जाएंगे जो इनके लिए परेशानी बनेगी इनके लिए सिर्फ दो नेता ही काफी है! बहुत मुमकिन है जिस प्रकार आरिफ मसूद ने आरिफ अकील का सम्मान किया वह भी समर्थकों को हजम नहीं होगा।मगर एक बहुत अच्छी बात है कि आज दोनों नेता एक दूसरे के प्रति इस सम्मान पर आ चुके हैं और आने वाले समय में और नफरत खत्म होगी इसकी चर्चा सर गरम है
