सारे विश्व मे इस समय मुसलमानों का पवित्र माह रमज़ान चल रहा है।रमज़ान के आखरी अशरे(आखरी दस दिन) में रोज़ा रखने वाले कई मुस्लिम घर छोड़ कर मस्जिदों में क़याम (निवास) करते है और अल्लाह की इबादत करते है जिसे एतक़ाफ़ कहा जाता है।
वाकिफ़ खबर से चर्चा करते हुए जनाब मुफ़्ती जुनेद साहब बताते है कि रमजान और एतक़ाफ़ अपनी दो हैसियत रखते हैं “एक रूहानी एक जिस्मानी” रूहानी हैसियत तो ये है कि रोज़ेदार क़रीब से क़रीब होता चला जाए अल्लाह के क्योकि रमज़ान के महीने में शयातीन(शैतान) बांध दिए गए हैं।माहौल को रूहानी और नूरानी बनाना है इसलिए बंदे से खाना-पीना छुड़ा लिया जाता है आखिरी अशरे (रमज़ान के महीने में दस- दस दिन के तीन अशरे होते है) में रोज़ेदार वेटिंग में चला जाता है।
बंदे को अल्लाह अपने घर(मस्जिद) में बुला लेता है।अल्लाह इसको शबेक़द्र का इनाम देना चाहता हैं।अल्लाह की तरफ से खुसूसी इनाम शबेक़द्र में नाज़िल होगा जो मोहब्बत का इनाम है अल्लाह के करीब हो जाने का इनाम है।उसे वसूल करने के लिए बंदा घर छोड़ कर जब मस्जिद में जाता है तो अपना कररोफर(ठसक) सब छोड़ देता है और जमीन में जाकर मस्जिद में बंदा पड़ जाता है चाहे वह मुल्क का कितना ही बड़ा आदमी क्यो ना हो।उसका घर कितना ही आलीशान हो लेकिन वो अल्लाह के घर में पड़ा रहता है और चौबीसों घंटे अल्लाह को याद करता रहता है।
एतक़ाफ़ दरहक़ीक़त अल्लाह के लिए सब कुछ कुर्बान कर देने और अल्लाह का ही हो जाने की एक अदा है,10 दिन में बंदा उसे निभाता है और शबे कद्र का रूहानी इनाम लेकर आ जाता है। इसको ईद के दिन जिस्मानी इनाम मिलता है।ये तो हुआ एतक़ाफ़ का रूहानी चैप्टर।
जिस्मानी चैप्टर में ये है कि इंसान में एक मिजाज़ पाया जाता है कि इसको जितना मिलता है इसको कम लगता है एक लालच का मिजाज़। इस लालच के मिजाज ने इंसान को जानवर बना कर खड़ा कर दिया है इसकी भूख खत्म नहीं होती है यह बढ़ती ही चली जाती है।बढ़िया से बढ़िया खाना खाने के बाद भी हम देखते हैं कि इंसान को सब्र नहीं होता।ज़्यादा से ज़्यादा पाने की इंसान की हवस खत्म नहीं होती। रमजान और एतक़ाफ़ हवस को तोड़ने का तरीका है।इंसान को बिल्कुल बुनियादी जरूरत पर लाकर खड़ा कर दिया जाए,पानी खाना ही ना दिया जाए तो फिर इसको इसी की क़द्र होने लगती है। हर साल जब आप जब 30 दिनों तक अपने खाने-पीने की हवस तक को ब्रेक देते रहेंगे तो इसकी हवस खाने पीने में आगे नहीं बढ़ेगी लिमिट में रहेगी। इसी तरह एतक़ाफ़ में बंदाअपने घर से दूर हो जाता है बिल्कुल “इनिशियल नीड्स” पर लाकर छोड़ दिया जाता है। 10 दिन बाद जब बंदा अपने घर पहुंचता है तो इसे जो चादर मिल जाए जो सोने की जगह मिल जाए सब की बहुत ज्यादा क़दर होगी।

इस सवाल के जवाब में की एतक़ाफ़ “इंफ़्रादी इबादत है या इज़तीमाई” मुफ़्ती जुनेद साहब कहते है कि,
एतेकाफ खालिस इंफ्रादी इबादत है इसीलिए मस्जिदों में खेमे लगा दिए जाते हैं। लेकिन अगर किसी अल्लाह वाले की कोई सोहबत मोतकिफ़ को मयस्सर हो गई और कुछ “दीन” की बातों वो सुन लेता है तो उसकी इजाजत है।हुजूर स.अ.स.(पगैम्बरे इस्लाम)के दौर में भी सहाबा एतक़ाफ़ में बैठते थे और “दीन” की बातें सुनते थे। इसलिए “दीन” की बातें सुनने की इजाजत है लेकिन इस बात का ख्याल रखा जाए कि मस्जिद में जलसे जैसा कोई माहौल ना हो जाए।
