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Vaqif Khabar

जरूरतमंदों का सहारा बना “अंजुमन इस्लाम बैतूलमाल” मआशी और तालीमी शौबों में खिदमत जारी

ByM. Farid

Mar 12, 2026

जरूरतमंदों का सहारा बना  “अंजुमन इस्लाम बैतूलमाल”  मआशी और तालीमी शौबों में खिदमत जारी

 

इंदौर से अज़हर मिर्ज़ा की रिपोर्ट

इंदौर (रानीपुरा): समाज की खिदमत और ज़रूरतमंदों की फलाह-ओ-बहबूद (भलाई) के लिए अंजुमन इस्लाम बैतूलमाल, रानीपुरा एक मज़बूत सुतून (स्तंभ) बनकर उभर रहा है। ‘वाक़िफ़ ख़बर’ से एक खुसूसी (विशेष) गुफ्तगू के दौरान अंजुमन के सेक्रेटरी डॉ. सरफ़राज़ अंसारी ने इदारा की कारगुजारी और इसके असरदार निज़ाम पर रोशनी डाली।

 

 

“तस्दीक (सत्यापन) के बाद ही दी जाती है इमदाद”

 

डॉ. सरफ़राज़ अंसारी ने ज़ोर देते हुए कहा कि अंजुमन का पूरा निज़ाम निहायत शफ्फाफियत (पारदर्शिता) पर मबनी है। उन्होंने बताया कि किसी भी शख्स की मदद करने से पहले उसकी मुकम्मल तस्दीक (Verification) की जाती है, ताकि समाज का पैसा वाक़ई मुस्तहिक (Deserving) लोगों तक ही पहुँचे।

 

राशन से लेकर तालीम और महिला सशक्तिकरण तक का एहतमाम।

 

तालीमी सरपरस्ती: गरीब बच्चों की पढ़ाई का पूरा खर्च अंजुमन उठाता है ताकि आर्थिक तंगी उनके मुस्तकबिल (भविष्य) की रुकावट न बने।

 

राशन किट: बेसहारा और कमज़ोर परिवारों के लिए नियमित रूप से राशन किट की फराहमी की जाती है।

 

ख्वातीन की मदद: संस्था महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने पर विशेष ध्यान दे रही है। ज़रूरतमंद ख्वातीन को सिलाई मशीनें मुहैया कराई जाती हैं ताकि वे घर बैठे इज्जत के साथ अपनी कमाई कर सकें और परिवार का सहारा बनें।

 

खैरात लेने वाले अब बन रहे हैं ‘साहिब-ए-खैर’

 

अंजुमन का सबसे अहम मिशन लोगों को ‘खुद-कफील’ (Self-dependent) बनाना है। डॉ. अंसारी ने बताया कि संस्था ज़रूरतमंदों को छोटा कारोबार शुरू करने में भरपूर मदद करती है।

 

व्यापारिक सहायता: बेरोज़गारों को ठेले (Carts) खरीद कर देना और शुरूआती कारोबार के लिए फल-फ्रूट व अन्य सामान मुहैया कराना ताकि वे अपना बिज़नेस शुरू कर सकें।

हज़ारों लोग हुए आत्मनिर्भर: उन्होंने फख्र के साथ साझा किया कि आज ऐसे हज़ारों लोग हैं जो कभी अंजुमन की मदद से अपना काम शुरू किए थे और आज वे न सिर्फ अपना घर सम्मान से चला रहे हैं, बल्कि अब वे ज़कात लेने वाले नहीं बल्कि ज़कात देने वाले बन चुके हैं।

हुब्ब-ए-इंसानियत का जज़्बा

डॉ. अंसारी ने अवाम-उन-नास से अपील की कि इस ‘सदक़ा-ए-जारिया’ में बढ़-चढ़कर हिस्सा लें। उन्होंने स्पष्ट किया कि हमारा मक़सद सिर्फ़ भीड़ जमा करना नहीं, बल्कि कौम के एक-एक शख्स को मआशी (आर्थिक) तौर पर आज़ाद और मज़बूत बनाना है।

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